Friday, August 31, 2018

यमला पगला दीवाना फिर से का बन जाना और परदे पर आ जाना एक ईश्वरीय चमत्कार है !



जब आप इस फ़िल्म को देखते हैं तो आप नास्तिक से आस्तिक बन जाते हैं। क्योंकि फ़िल्म में कहानी है नही और अक्सर ये लगता है के कैमरा चालू करके देओल परिवार और बाकी अभिनेता अपने हिसाब से अभिनय कर रहे थे। इसलिए फ़िल्म का बन जाना और परदे पर आ जाना ईश्वर का चमत्कार ही माना जाना चाहिए।

इससे भी ज़्यादा दुःख इस बात का होता है के धर्मेंद्र हमारी सिनेमा के इतिहास के सबसे बेहतरीन कलाकारों में एक हैं। सनी ने भी कई अच्छे पात्र निभाए हैं। इन दोनों को जब इतनी स्तरहीन फिल्मों में आप देखते हैं तो आप इतना ज़रूर सोचते हैं के क्या एक अच्छी कहानी और अच्छा निर्देशक ढूंढ़ना इतना मुश्किल है और क्या बाकी का काम ये दो कलाकार अपनी पुरानी विरासत और वफादार प्रशंसकों के सहारे निकालेंगे?

फ़िल्म की कहानी का उद्देश्य अच्छा है के कैसे भारतीय आयुर्वेद हमें स्वस्थ बना सकता है। कैसे अक्सर नया हस्पतालों और दवा कंपनियों का गोरख धंदा हमारी जेबें और स्वस्थ्य दोनों को ढीला कर रहा है इसपर भी इस फ़िल्म में रौशनी डाली जा सकती थी। लेकिन निर्देशक इसे आम मसालों में ठीक से भिगो के पेश नही कर पाया। सनी देओल के भाग कर सामने से आते ट्रक को रोक देने के दृश्य इस फ़िल्म को एकदम फूहड़ बना देते हैं।

कुछ दृश्यों और सम्वादों पर आप हँसते हैं लेकिन बाकी फ़िल्म घिसट घिसट के चलती है। इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होना तय है लेकिन फिर भी इससे देओल परिवार की लोकप्रियता काम नही होगी उन्हें ज़रुरत एक अच्छे निर्देशक की है।





स्त्री - ज़बरदस्त कॉमेडी और हॉरर का तालमेल आपको बांध के रख लेगा !




अक्सर बॉलीवुड हॉरर फिल्में बनाता है। होती वो इतनी ख़राब हैं के हम उन्हें कॉमेडी फ़िल्म की तरह देखते हैं। लेकिन इस फ़िल्म के  निर्देशक ने एक हॉरर कॉमेडी फ़िल्म बनायी है और इसकी कॉमेडी इतनी तगड़ी है के आप शायद कुछ दिनों तक कुछ दृश्यों को याद करके मुस्कुराते रहेंगे जैसे वो दृश्य जब गायब हो गए एक  लड़के की माँ उसके कच्छे को पकड़ के रो रही होती है। लेकिन पहले आप फ़िल्म की थोड़ी कहानी समझ लें। 

चंदेरी नाम के छोटे शहर में एक स्त्री की आत्मा , जिसे सब स्त्री ही कहते हैं रात में पुरुषों को उठा ले जाती है। पीछे वो सिर्फ उनके वस्त्र छोड़ जाती है। एक रहस्यमयी लड़की श्रद्धा कपूर के ऊपर संदेह होता है के ये ही वो स्त्री है और विकी (राजकुमार राव) नाम का लड़का उससे प्यार करता है। कैसे शहर को स्त्री से मुक्ति मिलती है यही फ़िल्म की कहानी है।

जैसा की ऊपर मैने लिखा फ़िल्म  की  सबसे बड़ी खूबी है उसका हास्य या कॉमेडी जो कहीं भी अश्लील नहीं होता जैसे पिता का पुत्र को स्वयंसेवी बन जाने की सलाह देने वाला दृश्य। फ़िल्म में ज़बरदस्त संवाद हैं जिनका उद्देश्य भी आपको हँसाना है जैसे - ये अमोल पालेकर बाहुबली कैसे बन गया या अबे हम इंसान हैं पतंग नहीं है जो तुम उड़ा उड़ा के फ़ेंक रहे हो।

कहानी का और एक सबसे अच्छा पहलू है के पात्रों के बीच के रिश्तों को बड़े अच्छे ढंग से उभारा गया है जैसे की विकी और उसके दोस्तों के बीच का रिश्ता यहाँ अपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी के अभिनय की तारीफ करना आवश्यक है। दोनों कलाकारों ने अपने अभिनय से तीन दोस्तों की कहानी को ऊपर उठाया है।

पंकज त्रिपाठी ने रुद्रा भैया के अभिनय को अपने उसी मस्त आशवस्तअदा से निभाया है जिसके लिए उनकी पहचान है। स्त्री से मुक्ति पाने के चार कदम जब वो बतलाते हैं तो आप हँसते भी हैं और उनके अभिनय के रसिक भी बनते हैं।

स्त्री की एक और खूबी है इसके अंदर एक छोटे शहर के वातावरण को अच्छे ढंग से उभारा गया है। फ़िल्म का हॉरर भले आपको उतना अलग या महान न लगे  लेकिन निर्देशक ने कम से कम घिसे पिटे हॉरर से बेहतर ही  घटनाएं दिखाई हैं।

फ़िल्म देखने लायक है मेरी रेटिंग तीन स्टार



Wednesday, August 29, 2018

A grand battle of content arrives this September in Bollywood !



After a long time this September will be an interesting month for all of us Bollywood buffs. I would want to add the last release date of 31st August too to this interesting unfolding scenario. Off late bollywood has been wedded to high level promotions and big stars riding big name duds. This month changes all that starting 31st  August to 30th September we have an array of movies which are totally driven on content. None of them has a single today’s superstar. Sure some of them have done great work in the past but this is like them trying to redeem themselves or telling us they have some fire power left in them. What makes this month extremely nail bitingly interesting is that all these movies drive themselves on a unique content theme or a content theme which is an old trusted weapon like comedy. However make no mistake all these movies will hope that the content clicks and their movies work on word of mouth. Now ask yourself when did this happen last in Bollywood. You will have to go back to way back into dates like 2008 and 2007 since then Bollywood had become Khans, Kumars and Hype based industry.

You can look at some of these dark horses here



Stree – This one is a horror comedy which has a tinge of romance in it. Rajkumar Rao and Pankaj Tripathi with Shraddha Kapoor add to the star power of this movie. Now given that all of them are not heavy duty the trailer has caught on big time on internet and given that in its background is a true incident which took place in Telangana a few years back this one is sure a dark horse

Yamla Pagla Deewana Phir Se – Contrary to the purist media’s stand the three deols together have driven good box office numbers. Yamla Pagla Deewana brings back the same whacky comedy aura and the attitude to laugh at their own selves from the Deols. This one could be a big winner given not much competition in September.

Manmarziyan – Anurag Kashyap is going back to what made him popular – telling dark love stories. Fact is popular eye caught him when he gave us the dark and racy DevD. For a lot many this is not Anurag Kashyap’s forte and I can say with some confidence that Manmarziyan could get Anurag the much needed Box Office glory –even Mukkabaaz’s better moments were when the love story was unfolding. This could also be Abhishek Bachchan’s redemption but make no mistake in this movie too content is supreme

Batti Gul Meter Chalu – If I had to place my bet on one movie that could surprise us with its box office victory it is this movie. It is helmed by Shree Narayan Singh who gave us the social super hit called Toilet Ek Prem Katha and here too he touches a raw nerve through the trailer about the corruption in power departments of India. This one has a tinge of retribution in the content and the lucky mascot of all revenge movies is in this one too namely Shraddha Kapoor, you just have to look at the numbers of Ek Villain and Baaghi to understand what I am saying.

Sui Dhaaga – Each time Yashraj films hits a low phase they have revived themselves by fresh content cinema. Some of their recent better wins have been in movies like Dum Laga ke Haisha and Hichki. This one has created a buzz in the multiplex audiences and Anushka getting trolled for her crying will only add to the buzz. The trailer does promise a rich content of small town dreams. This one could win big.



Paltan – A lot many are saying that Paltan looks like Border reloaded and this is where they are so wrong and this is where we get our heartland and mass cinema totally off the radar. Fact is the story of Nathula 1967 is not known to many Indians. This is a story where a new confident stood to the tyranny of the Chinese Dragon. Sometimes stories of Valour are enough to ride into hearts of audiences even if scenes or screenplay looks forced to the purists – you need to look at the numbers Parmanu made without any media or hype support.

Come September. Week after week. We will see a battle of content. Am riding into theaters every Friday for sure.


Friday, August 24, 2018

आपको गुगुदाएगी ये हँसी के पलों से भरपूर एक हलकी फुलकी कहानी !



हैप्पी  फिर भाग जाएगी  एक ऐसी फ़िल्म है जो आपको थोड़ी देर के लिए ही सही अपनी परेशानियां भुला कर हँसाती है। फ़िल्म की कहानी ऐसी नही है के आप दांतो तले उंगली दबा लें। लेकिन निर्देशक ने एक अच्छी कहानी को कॉमेडी के मसाले में भिगो कर पेश किया है। अगर आप अपनी उम्मीदों को थोड़ा काबू में रख के इस फ़िल्म को देखें तो कई जगह ये फ़िल्म आपसे थोड़ी वाह वाह भी करवा लेगी। 

कहानी यूं है के एक ही दिन चीन के एक बड़े शहर के एयरपोर्ट पर दो हैप्पी आतीं हैं और दोनों एक दूसरे की पहुँचने वाली जगहों पर पहुँचती हैं। इसके बाद कहानी कई मोड़ घूमती है और नयी हैप्पी पुरानी हैप्पी की मदद से अपनी मंज़िल पा लेती है। 





फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबियाँ दो हैं एक हैं इसके नए पात्र जिनमे सबसे आगे हैं सोनाक्षी सिन्हा , सोनाक्षी को जितनी मीडिया से तारीफ़ मिलती है वो उससे थोड़ा बेहतर ही अभिनेत्री हैं और इस फ़िल्म में भी उन्होंने अंदर से डरी और परेशान लेकिन ऊपर से जुझारू हैप्पी का किरदार बहुत अच्छे ढंग से निभाया है। कॉमेडी के पल और भावनात्मक दृश्य उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से निभाए हैं। जस्सी गिल ने खुशवंत सिंह नाम के एक बड़े दिल वाले सिख का  अभिनय किया है और कॉमेडी पर उनकी पकड़ भी अच्छी दिखी है। 

फ़िल्म की दूसरी बड़ी ख़ूबी है के तरह तरह के घुमाव और घटनाओं के बीच जिस तरह से कॉमेडी बाहर आती है मसलन वो हिस्सा जब बग्गा और आफरीदी को चीन की जेल के अंदर जाकर पता चलता है के जेलर एक महिला है और इससे एक ज़बरदस्त कॉमेडी का दृश्य सामने आता है। 

लेकिन एक बार फिर फ़िल्म को असली मज़ा आता है आफ़रीदी और बग्गा की जोड़ी से , पियूष मिश्रा और जिमी शेरगिल ने एक बार फिर रंग जमाया है। ख़ास तौर से बग्गा का बार बार तेरा भाई कहना और आफ़रीदी का झुंझलाना फ़िल्म  को अलग रंग देता है। 

फ़िल्म पैसा वसूल है और इसलिए मेरी रेटिंग इस फ़िल्म के लिए साढ़े तीन स्टार। 




Thursday, August 16, 2018

परदे पर पुलिस वाले जलते हैं और सिनेमा हॉल में दर्शकों के दिमाग की नसें !



इस फ़िल्म को देख कर मैं  इस फ़िल्म के निर्माता की बहादुरी से बहुत प्रभावित हूँ। एक तो ऐसी फिल्म के ऊपर पैंतीस करोड़ लगा देने के लिए जिगर तो चाहिए। फिर अभी मैने किसी वेबसाइट पर पढ़ा के इस फ़िल्म के लिए निर्देशक को तीन करोड़ रूपया दिया गया है , ये बात कितनी सही या गलत है इसकी पुष्टि में नही कर सकता ।  मेरी समझ से तीन हज़ार के ऊपर निर्देशक ने जितना लिया है वो उनका मुनाफा है क्योंकि इस फ़िल्म पे मेहनत उन्होंने तीन हज़ार रुपये से ज़्यादा की नही की है।


हिंदी फ़िल्म का एक पुराना उसूल है के साहब फ़िल्म देखिये सवाल मत पूछिये। इस फ़िल्म को देखते वक्त आपको दिमाग तो बंद करना होगा ही शायद आप अपने हाथ भी बांध लेना चाहें क्योंकि मध्यांतर के बाद आप खुद को ही थप्पड़ मारना भी शुरू कर सकते हैं।

फ़िल्म की कहानी ये है के एक बेटा अपने बाप का बदनाम नाम फिर उबारने के लिए तरह तरह के भ्रष्ट पुलिस वालों को पॉपकॉर्न समझ के चिता पे भूनने लगता है। हुआ ये था के ग़लत इलज़ाम में फंसा पिता अपने को जला लेता है।

फ़िल्म का स्क्रीनप्ले इतना घटिया है के एक पात्र अपने सगे भाई से टकराता है लेकिन उसे पहचान नही पाता। जिन लोगों को हत्यारा मार रहा है उन्हीं की पेंटिंग बना के प्रदर्शित कर देता है। मनोज बाजपेयी जिस अफसर के साथ दिन रात रहते हैं उसी की बेटी को नही पहचानते। जॉन क्लाइमेक्स में एक ज्ञानी बाबा की तरह सूचना देते हैं के उनके पिता को किसने फंसाया था और बिना सबूत वो आदमी अपना गुनाह मान भी लेता है।

फ़िल्म की शुरआत में कुछ अच्छे संवाद हैं लेकिन शायद संवाद लिखने वाले का चेक मध्यांतर के आस पास के संवाद लिखते तक बाउंस हो गया इसलिए मध्यान्तर के बाद सारे पात्र अपनी अपनी समझ के हिसाब से संवाद बोलते हैं। मनीष चौधरी ने दूर किसी चिड़िया को घूरने वाले आदमी की एक्टिंग की है जो कभी किसी की आँखों में नहीं देखता और कहीं न कहीं और आसमान की तरफ या किसी ऊँची बिल्डिंग को देख के बात करता है। क्लाइमेक्स में उन्होंने शायद पहली बार ओवर एक्टिंग की है और ये निर्देशक का सबसे बड़ा करिश्मा है।

फ़िल्म की नायिका खूबसूरत हैं तब तक जब तक वो बोलना शुरू नही करती।

हर जगह जॉन अब्राहम नारायण भगवन अवतार से प्रकट होते हैं और न्याय करते हैं। स्पाइडरमैन  और सुपरमैन को भी अक्सर टीवी या पुलिस के साइरन से गड़बड़ का पता चलता है लेकिन जॉन इन सबसे कहीं आगे हैं।

एक ज़माने में सनी देओल कभी खम्भा कभी हैंडपंप फोड़ते थे ,फर्क ये था के सनी की फिल्में वो डायरेक्टर बनाते थे जिन्हें अपना काम और कहानी दोनों मालूम थीं , लेकिन  जॉन से कोई मोटरसाइकिल उठवाने लगा है कोई कार  उठवा रहा है और इस फ़िल्म के निर्देशक ने उनसे टायर फटवाया है। वो किसी को मुक्का मार रहे हैं तो वो तीन दीवार तोड़ के गिर रहा है।  ऐसे दृश्यों के अलावा फ़िल्म में जलती हुई आग के तरह तरह के दृश्य हैं।

बात बात पे जॉन के डोले दिखाए गए हैं। जहाँ जहाँ डोले दिखने में तकलीफ हुई वहां वहां जॉन स्वयं का वस्त्र हरण करके डोले दिखाते हैं।

मनोज बाजपेयी ने ये फ़िल्म अपनी किसी नयी ज़मीन का लोन चुकाने के लिए की होगी। क्योंकि उनके जैसा एक्टर इस सर्कस में कर क्या रहा है वो समझ नही आया।


फ़िल्म ज़रूर देखें आखिर दान पुण्य करना भी ज़रूरी है और निर्माता के भी बीवी बच्चे होंगे।



Wednesday, August 15, 2018

आपको रुलायेगी और हंसाएगी लेकिन सबसे ज़्यादा आपको अपने खेलों की विरासत पर गर्व करवाएगी गोल्ड !




अक्षय कुमार की गोल्ड की सबसे बड़ी खूबी है के पूरे ढाई घंटे की अपनी लम्बाई में ये फ़िल्म एक से बढ़ कर एक रंग दिखाती है। फ़िल्म में एक नए आज़ाद हुए मुल्क के लोगों की बड़ी परेशानियों की तरफ़ इशारा है। एक आदमी का कुछ कर गुजरने का जज़्बा है। कहानी में संवाद अच्छे हैं कम से कम दो गाने अच्छे हैं लेकिन सबसे बड़ी बात गोल्ड फ़िल्म की ये है के आप का ध्यान कभी भी और कहीं भी तपन दा के संघर्ष से हटता नही है। 

फ़िल्म की कहानी शुरू होती है १९३६ के बर्लिन ओलम्पिक से जहाँ जूनियर मैनेजर तपन मन में ठान लेता है एक एक दिन वो आज़ाद भारत को हॉकी का गोल्ड मैडल दिलवा के रहेगा। उसका सपना साकार होने को एक दो नहीं पूरे बारह साल लग जाते हैं। टीम गोल्ड मैडल जीत लेती है और एक साथ दो पीढ़ियों का सपना पूरा होता है।  ये दो पीढ़ियां कौन सी हैं ? इसके लिए आप गोल्ड देखिये। 

फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी है के छोटे छोटे पलों और इसके किरदारों के सहारे कहानी आगे बढ़ती है। फ़िल्म में अक्षय ,विनीत सिंह , कुणाल कपूर ,सनी कौशल इत्यादि के पात्र तो बढ़िया लिखे ही गए हैं। लेकिन इसके छोटे छोटे पात्र जैसे वाडिया  मैनेजर भी रंग जमाते हैं। 

फ़िल्म की जज़्बाती गहरायी बड़े अच्छे ढंग से उभारी गयी है। जैसे वो दृश्य जब तपन अपने मैनेजर मेहता को समझाता है के बात देश की है राज्य या अपने अपने एहम की नहीं।  फिल्म की कहानी को दिलचस्प रखने के लिए निर्देशक ने कहानी के घुमाव भी अच्छे रखे हैं जैसे अचानक एक अच्छी बनी टीम देश के विभाजन से बिखर जाती है।  कैसे तपन को टीम फिर बनाने का हौसला मिलता है। लगभग हर दस मिनट के निकलते निकलते आप फ़िल्म से और ज़्यादा जुड़ते हैं। 

बॉलीवुड की इस साल की बेहतर फिल्मों में गोल्ड है और आप को ये फ़िल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।  मेरी रेटिंग ४ स्टार। 



Tuesday, August 14, 2018

सुई धागा - एक सीधी कहानी को ज़बरदस्त गहरायी से दिखाता ट्रेलर !



सुई धागा के ट्रेलर में दिखता मौजी राम आपको अपने आस पास के कितने लोगों की याद दिला देगा। ट्रेलर में एक ज़बरदस्त ढंग से कही गयी कहानी की झलक दिखती है जिसका मुख्य पात्र एक सीधा भोला नौजवान है जिसका नाम है मौजीराम। अपनी पत्नी ममता के साथ रहता वो अपने अपमान में भी ख़ुशी ढून्ढ लेता है।


अपनी पत्नी के प्रोत्साहन से वो अपनी मंज़िल ढूंढ़ने निकल पड़ता है और अपना कुछ करने की दोनों ठान लेते हैं। धीरे धीरे दोनों पति पत्नी अपनी मेहनत से शायद उस मंज़िल को पाते भी हैं। लेकिन ट्रेलर आपको निर्देशक शरत कटारिया की कहानी पर ज़बरदस्त पकड़ का आभास कराता है।

ट्रेलर में कॉमेडी के मौके हैं। जैसे वरुण धवन का अपनी पत्नी को ये कहना के रोज़ उसे डॉगी नहीं बनाते कभी छत का बन्दर या बाजार का भांड भी बनाते  हैं। ट्रेलर में जज़्बात भी हैं कुछ आपको हिलाने वाले के कैसे मौजी राम जगह जगह ताने खाता है। कुछ आपको मुस्कुराने पे मजबूर करने वाले जैसे कैसे वो सड़क पे लगी रोड लाइट को रौशनी के लिए घुमा लेता है।

लेकिन ट्रेलर की सबसे बड़ी खूबी यही है के छोटे छोटे संवादों के ज़रिये और कुछ दृश्यों के ज़रिये निर्देशक ने कहानी को ट्रेलर में बड़े अच्छे ढंग से समेटा है। ट्रेलर एक ऐसी कहानी की झलक देता है के कड़वाहटों में उलझने के बजाय मंज़िल ढूंढ़ना ठीक होगा।

वरुण धवन ने ट्रेलर में एक ज़बरदस्त अभिनेता होने का  फिर सबूत दिया है। पिछले कुछ समय अपने को एक हर तरह का अभिनय कर लेने वाले अभिनेता की तरह हमारे सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं , अक्टूबर में उनका अभिनय उम्दा था लेकिन एक ढीली पटकथा और कमज़ोर निर्देशन उस फिल्म को नही बचा पाया।

यहाँ शशांक कटारिया ने उस कमज़ोरी को दूर रखा है और ट्रेलर देख कर तो लगता है के वरुण धवन के नाम एक और हिट फ़िल्म होने वाली है।


sui dhaaga - the trailer is refreshing, different and warm !



This is one hell of a different trailer. Varun Dhawan is a good actor and there is no doubt about it. He is also trying to break his image away from the kind of cinema he has done till date is also evident from this effort. He did try an October a few months ago but there the script and the director totally failed him.

Here Varun the actor is totally a part of a script that is well written and well placed. Varun is a directionless guy who lives in his self created happiness till his wife wakes him up to a better meaningful life. The man sets out and creates a journey of redemption and probably success too. This is what the trailer tells you. The real story in any case might not be very different.

Anushka Sharma is good enough but the trailer focuses on Varun Dhawan and to be fair he totally snatches it away from every one in each frame.

Director Sharat Kataria is in epic touch and he seems to be continuing with his calling in small town feel good cinema. The trailer gives us the plot,remains completely watchable and drops situations which take place in every day small town families.

There are such lovely humour lines like roz doggy nahi kabhi gali ka sand kabhi bazaar ka bhand. The trailer makes you laugh and smile. It also tugs at heart in a way how good people go through pain and cruel situations.

Stories of positivity and hope when packaged well and told well can hold you and they also mean box office success. In all probability Varun Dhawan fans can look forward to a big surprise hit.




Monday, August 13, 2018

Three decades of probably the best woman oriented revenge thriller of the 80s !

Khoon Bhari Mang completed three decades on 12th August. A movie that established Rakesh Roshan's image as a director who had command on his stories and could deliver hits. This movie proved that his first outing as a director was no fluke.

Khoon Bhari Maang is one of the hits that were part of the glorious second innings that Rekha was playing which had other hits like Phool Bane Angarey and Insaaf Ki Awaaz. However for the sheer quality of its technical brilliance and a screenplay that never really loses its focus this movie was probably the best thing that Rekha did post Silsila.

Shatrughan Sinha played a brief cameo in this one probably as a favour to good friend Rakesh Roshan but then this movie and probably ones like Sherni also proved one point about Sinha which has till date largely gone unnoticed that he was that rare male star of the 70s and 80s who was never really scared about doing brief appearances and letting the heroine take some or more than his limelight.

Khoon Bhari Maang was however dominated by the ruthless,slimy casanova Sanjay played by Kabir Bedi. Bedi returned to bollywood with this movie after a long absence due to his assignments in Hollyood. Probably he could not have asked for a better return as Roshan gave him a role which was probably one of the best written villain roles in the 1980s. Sanjay Verma did not have the high drama of a Mogambo or a Shakaal but this manipulative cold blooded man who does not shy away from pushing a woman to crocodiles and a helpless old servant to his death could make your spine shiver with cold fear. It was in fact this battle of the powerful slimy Sanjay and the helpess trusting Arti played by Rekha that turned Khoon Bhari Mang into the classic watchable fare of the underdog vs a more powerful nemesis.



KBM was not just a racy thriller Rakesh Roshan was in super story telling touch in this one and therefore it had moments where you could cry unabashedly with what unfolded on the screen. My most favourite are two of these one where when her own children do not recognise Arti the pet dog does and breaks chain to come and greet her. The second one when the young daughter forgets her line while singing a song that Arti herself sings, struck by the fact that she cannot help the daughter because that will reveal her identity the son walks in at the right time to rescue his struck sister. KBM moves in a way that with every passing frame you get connected with the family of Arti.

KBM also had some very well written characters. Like Satyajit as the mute servant this was his only role of some meat after playing Sunny Deol's mechanic buddy in Arjun. The other character was the one played by the superstar of soundless cinema Jairaj as the man who rescues Arti from near death. KBM moved like an engrossing bestseller on screen and was in some ways a bit ahead of its times too where a widow chooses to remarry to actually give her kids and herself not just redemption in life. In fact the movie had some brave lines which said that besides just being a mother Arti was entitled to her share of selfishness too.

The movie has a very well written climax within the limitations of Masala cinema of the 1980s and the point where Arti ruthlessly kills the man who had betrayed her trust in the most cruel manner is given the same way back to hell is the highlight of the movie and absolutely the way this story could have ended.

Sure with time some parts of the movie might look dated to you but the fact that this movie after three decades is still worth watching speaks volumes about Rakesh Roshan's content creating skill.




Sunday, August 12, 2018

द मेग - ये कहानी आपको एक बार मज़ा दे सकती है !



कुछ फिल्में बहुत शोर  शराबे के साथ प्रदर्शित नही होती हैं। लेकिन अगर आप उन्हें देखने चले जाएँ तो कम से कम आपके पैसे बरबाद नही होते। साथ ही आप का थोड़ा बहुत मनोरंजन हो जाता है और कम से कम आप बोर भी नही होते।



द मेग इसी तरह की फिल्मों में एक है। फ़िल्म की कहानी एक विशालकाय शार्क मछली मेग्लोडन पर आधारित है। एक गोताखोर जैसन के ज़िम्मे मेग्लोडन से कुछ वैज्ञानकों को बचाने का काम आता है। जैसन एक बार पहले इस शार्क से कुछ लोगों को बचा चुका है और एक बार फिर जब इस शार्क के हाथों कुछ निर्दोष मारे जाते हैं  तो जैसन और उनके साथ बचे हुए वैज्ञानिक इस शार्क को मारने का निर्णय लेते हैं।

धीरे धीरे बढ़ती कहानी कुछ पचास मिनट के बाद तेज़ी से दौड़ती है और जैसन अपने साथियों की मदद से अकल लड़ा के इस शार्क को उसके अंजाम तक पहुंचा देता है। शार्क को मारने का उसका तरीका अच्छा था।

फ़िल्म में थोड़े झटके , थोड़ी कॉमेडी और थोड़े से ऐसे दृश्य भी हैं जो आपको लगेगा के ये तो पहले भी कुछ फिल्मों में आपने देखा है। लेकिन फिर भी फ़िल्म ज़्यादा समय दिलचस्प रहती है।

आप अगर रविवार को बोर हो रहे हैं और बेहतर करने को कुछ है नही तो आप इस फ़िल्म को देख सकते हैं।

मेरी रेटिंग एक बार देखने लायक फ़िल्म होने की वजह से तीन स्टार।




Friday, August 10, 2018

यमला पगला दीवाना फिर से - ट्रेलर में मसाला है ,शायद आप फ़िल्म देखना चाहें सिर्फ मौज मस्ती के लिए !



यमला पगला दीवाना का ट्रेलर आप के रोंगटे खड़े कर दे ऐसा नही है। न ही वो कोई देश समाज बदल देने का दावा करने वाली किसी फ़िल्म का ट्रेलर है। फ़िल्म का ट्रेलर आपको सिर्फ एक चीज़ का वादा करने की कोशिश कर रहा है और वो है खालिस मनोरंजन।





हो सकता है फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर चले या न चले लेकिन आपस में मस्ती से एक्टिंग करते देओल बंधू आपको अच्छे ही दिखते हैं। ट्रेलर में थोड़ी हंसी थोड़ा नाच गाना और थोड़ा एक्शन है। इससे ज़्यादा यमला पगला दीवाना सीरीज की फिल्मों में कुछ होता नही और शायद इसीलिए ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर थोड़ा बहुत चली भी हैं। जितना आप दर्शक से वादा करते हैं ट्रेलर में उतना ही फिल्म में होता है।

फ़िल्म में लेकिन एक चमक ज़रूर दिख रही है और उसका सबसे बड़ा कारण है धर्मेंद्र की कॉमेडी पर आज भी ज़बरदस्त पकड़। ट्रेलर की शुरुआत में ही वो अपने रंग में हैं और फिर ऐसे संवाद के मैं चालीस का नहीं सिर्फ उन्तालीस का हूँ। कम से कम आपको ट्रेलर देख के फ़िल्म से चिढ तो नही ही होती है ,आजकल ट्रेलर ही ऐसे आते हैं के आप निर्माता के लिए ट्रेलर देखते ही दुआ पढ़ना शुरू कर देते हैं।

और फिर रफ्ता रफ्ता पे रेखा और धर्मेंद्र को फिर से थिरकते देखने के लिए जाना ही एक वजह तो हो सकती है।

मैं फिल्म ज़रूर देखूँगा अपनी उम्मीदों पे कंट्रोल रख के बाकी तो रिलीज़ के दिन ही पता चलेगा।

Yamla Pagla Deewana - the trailer belongs to the paisa vasool genre

I was looking forward to the YPD phir se trailer. There are reasons. One that Bollywood fans rarely get to see Sunny and Dharmendra on screen together and while purists might scoff at it the first YPD actually had some fizz in it. Sunny and Dharmendra had the guts to laugh at themselves on the screen in that one. So did Bobby Deol. For example that famous scene from the first one where Sunny is trying to pump water out of a hand pump vigorously and Bobby asks him sarcastically - abey chalayega ya ukhadega ? pointing fun at the handpump scene of Gadar.


YPD second part was a disappointment. The Third trailer looks better than the second part at least.

YPD in any case belongs to fun and paisa vasool genre so the nation-changing cinema hunters in any case might avoid it but like me if you love cinema that makes you go on a ride of fun then YPD 3 or Yamla Pagla Deewana phir se looks like fun.

Frankly the trailer does not point out to a great plot but sometimes your chances of getting entertained better become high. To be fair the trailer of YPDPS does have some nice comedy moments.Will it work at the box office we don't know but I for sure would want to see Dharmendra and Rekha breaking a leg on the epic rafta rafta once again.

My last thoughts on this trailer when will the rest of bollywood makers wake up to a simple fact that Sunny Deol still has a lot of fire left in him. Are they not ,business wise speaking , just letting a cash generating machine get wasted?


जीतना ज़रूरी नही लड़ना ज़रूरी ठहरा !


कुछ ट्रेलर आपको एकदम से नींद से उठा देते हैं। कम से कम बत्ती गुल मीटर चालू का ट्रेलर आपको कुछ नींद से उठा जैसा देता है।

निर्देशक श्री नारायण सिंह ने बड़ी चालाकी से एक ऐसा ट्रेलर बनाया है जो पहले डेढ़ मिनट आपको कुछ ये पूछने पे मजबूर करता है के भाई क्या दिखा रहे हो ? या कहना क्या चाहते हो ? और फिर जब ट्रेलर आपको झटके देना शुरू करता है तो वहां से आप इस ट्रेलर से जैसे बंध से  जाते हैं।



फ़िल्म का ट्रेलर शुरू में आप को तीन युवाओं को आपस में मस्त मज़े से ज़िन्दगी बिताते दिखाया जाता है। दो दोस्त और एक लड़की। इनमें शाहिद और श्रद्धा  के बीच पनपती प्रेम कथा भी है। आप कह सकते हैं के फ़िल्म का असली ट्रेलर तो वहीँ से है जब एक दोस्त हालात और तंत्र के शोषण से परेशान होकर आत्महत्या करता है।  अपने मरे दोस्त की मौत की ज़िम्मेदार बिजली कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोलता है।

इस ट्रेलर में  थोड़ा बहुत कोर्ट के दृश्य भी हैं जो अच्छे बन पड़े हैं। बहुत समय के बाद यामी गौतम परदे पर दिखी हैं और अपना काम अच्छे ढंग से निभा रहीं हैं शायद।

ट्रेलर का सबसे अच्छा पहलू है उसके संवाद कभी हंसाते ,कभी रुलाते जैसे तब जब आत्महत्या कर चुके बेटे का पिता उसे कायर कह रहा है, लेकिन सबसे ज़बरदस्त संवाद ट्रेलरका वो है जो सीधा आपके ज़ेहन पे छपता है।  शायद वही इस ट्रेलर और आने वाली फ़िल्म का सन्देश भी है। वो संवाद क्या है उसके लिए शीर्षक ज़रा फिर पढ़ लीजिये !


Batti Gul Meter Chalu - probably the best trailer this month !

Finally you get a trailer on a real fight. The trailer is very smartly done by Shree Narayan Singh. For almost half the trailer you end up thinking what exactly is the man trying to show. There is general buffonery of a young trio. A freshly evolving story between two lovers.



Then just like that the trailer hits you with what this story is all about. How a man on the street can not just lose his dream but even his life because the system does not care. Shahid Kapoor is in a role which makes him emote and show shades. From being reduced to a glorious nothing in Padmaavat the man returns with a vengeance in this one.

The court room drama scenes promise voltage. A unpolished friend who seeks justice and revenge for his friend runs into probably a polished well placed lawyer and we all love the fights of the underdog against a powerful nemesis.

As is the most known aspect of a shree narayan singh movie this one has razor sharp dialogues - jeetna zaroori nahi ladna zaroori thehra !!

This trailer is surprisingly watchable and bloody good.

The movie is marked in my calendar.


Thursday, August 9, 2018

अनुराग कश्यप के लौटते फॉर्म की तरफ इशारा है इस ट्रेलर में !



एक ज़माना था जब अनुराग कश्यप फिल्में बनाते थे। जैसे देव डी और गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर। वो फिल्में हमें अच्छी भी लगती थीं।  फिर अचानक अनुराग कश्यप निर्देशक अनुराग कश्यप समाज सुधारक बन गया , इसमें भी कोई तकलीफ नहीं थी लेकिन कहीं न कहीं उनकी विचारधारा उनकी पटकथाओं को ढीला या उबाऊ बनाने लगी। ठीक है के मीडिया के एक  वर्ग ने इन फिल्मों को सर पे बैठाया पर वो ज़्यादा चली नहीं।



मनमर्ज़ियाँ पुराने अनुराग कश्यप के मेरे जैसे प्रशंसकों के लिए एक सुखद आश्चर्य है। फ़िल्म में आपको चितचोर और हम दिल दे चुके सनम जैसी फिल्मों की छाप दिखेगी लेकिन उससे बड़ी बात ये के इस फ़िल्म को अनुराग कश्यप ने नए समाज और नयी पीढ़ी के अंदाज़ में पेश किया है।

मसलन वो दृश्य जब तापसी का किरदार अपनी ही चाची को हनीमून के बारे में बता रहा  है। या वो दृश्य जब अभिषेक और तापसी एक दुसरे को बचपन वाले सवाल पूछते हैं।

फ़िल्म की कहानी में एक ढंग से देखा जाए तो नयापन कतई नही है दो प्रेमियों के कलह में कैसे कोई तीसरा बीच में फँस जाता है ये इस फ़िल्म में दिखाया गया है। फिर वही गलतफहमियां और आंसूं भी इस ट्रेलर में हैं। लेकिन बावजूद इसके कहानी अच्छी लग रही है क्योंकि अभिनेता अच्छे हैं और निर्देशक ने कहानी को शायद दिल से दिखाने की कोशिश की है।

क्या पूरी फ़िल्म ट्रेलर के जितनी दिलचस्प होगी ये कहना मुश्किल है लेकिन कम से कम दो दिन पहले आये लैला मजनू जैसे कनस्तर ट्रेलर से ये कहीं बेहतर है।


The trailer does point to Anurag Kashyap returning to form !



I have a simple feeling after watching this super fun trailer. Anurag Kashyap is back in form. Sure some of his recent movies were praised to the clouds by a certain section of the media. The collections of these over rated movies were nowhere near the praise. Finally the director who gave us memorable stuff like DevD and Gangs Of Wasseypur was getting lost in movies which were less movies and more political commentary.



There is nothing new about the story of Manmarziyan as this trailer shows. It has shades of both Chitchor and Hum Dil De Chuke Sanam in it. Anurag Kashyap has given it his brazen touch and the result is a watchable trailer at least.

Vicky Kaushal is in this one too. He is the flavour of the season and clearly he seems to have given the wild irresponsible lover a great touch, you will find his wild avtar totally unbelievable post watching him the soft kamli in Sanju.

Taapsee is a good actress and has already developed her distinct style which is again evident in this trailer.

Abhishek bachchan proves yet again that he is one of our most competent under rated actor who never got his due.

The best part of this trailer however is the typical anurag kashyap style in your face comedy. Like the end moment of the trailer. The trailer like the movie name has a in your face attitude which makes you anticipate a good movie.

one question remains unanswered will the whole movie hold as good as the trailer ? we don't know that but the trailer does make you ready for the movie .For starters that is enough.



Wednesday, August 8, 2018

The Pair which redefined Drama and Violence genre in 90s returns !




The cinema media generally ends up publishing news which we tend to hear after a while was not true. However as a teenager and then as a young man I grew up on the cinema of these two men. They redefined cinema for a lot of us in 1990s. Sunny Deol and Rajkumar Santoshi.  After a gap of 16 years the two have decided to work together again and nothing can be more epic,gigantic and exciting news.


For me the memories of Ghayal are etched like a deep line on a rock. The movie and its characters like Balwant Rair and ACP Joe Dsouza remain embedded in memories of millions.  In fact my watching Ghayal was an accident that I remain thankful for. Ghayal released alongside Dil and Aamir was the new sensation so a group of friends went to watch Dil , as luck would have it the movie show was sold out we decided to give Ghayal a shot. Sunny Deol holding a gun in a poster outside the theater did not really make us enthusiastic. We though we were walking into a typical boring action movie of the 90s. What unfolded on the screen in the next two and a half odd hour was pure epicness.
Ghayal rewrote the way violence,frustration and drama took place on screen. Sunny Deol got his screaming hero avtar from this movie. His full throated rants against the system in that now legendary police station outburst made it necessary for Sunny to scream for the next  11 odd years which ended up with the epic volcanic effect in Gadar. Screaming became mandatory for any action hero post Ghayal. That was the impact RK Santoshi created.
The duo made it up with solid consistency both Daamini and the Ghatak ensured that Sunny Deol and Raj Kumar Santoshi’s cinema was to the genre of violence what Yash Chopra and SRK meant for romance.
The movies these two created   were not just fist fist kick kick stuff. They had themes of the society.  If Ghayal was how the high and mighty can choose and destroy the lives of anyone and walk away scot free while the system would dance to their tunes. Damini spoke about how difficult the system makes it for a woman to get justice after a rape. In one of the most famous dialogues of the movie Damini the female protagonist claims that a woman is subject to a second rape in investigation.
Ghatak was about the land mafia and how the meek have no right to land in this country and it could happen in a city like Mumbai.
RK Santoshi and Sunny Deol created cinema which was almost realistic and yet masala. They never claimed intellect in their cinema that some of our half baked over rated makers of today ask for and even get from a ready to please media. Yet the cinema of RK Santoshi had more scathing and burning passionate intellect than a lot of today’s over celebrated cinema. For example that legendary scene in Ghayal when ACP Joe Dsouza confronts his Commissioner boss and asks him that why did he victimize or stay silent to the victimization of Ajay Mehra when actually Balwant Rai is the tormentor ?  When he signs off his unrelenting bashing of the system and his Boss by saying that – aisey kanoon ka saath den eke bajay mein vardi utaar ke Ajay Mehra ka saath dena behtar samajhta hoon – I still recall the way the entire theater went up in catcalls,whistles,claps and screams. It has been 28 years I don’t recall a character actor driving up such frenzy in a theater.  Or that epic interval moment of Ghatak when Kashi refuses the offer of Kathya to be his gang member and walks away.
In short RK Santoshi and Sunny Deol created cinema of moments. Which could compel you to watch it again and again and yet remain thirsty.
The two now intend to create a franchise out of Ghatak and given the story telling skills of RK Santoshi that besides Raj Kumar Hirani this is the only man who can today teach Bollywood sequels. Only his brand of cinema won’t be the soft and goodness of RK Hirani.
I shall be counting days now for the screen release of another guaranteed epic.


Tuesday, August 7, 2018

दो मिनट का ट्रेलर देख कर आप दो घंटे इस फ़िल्म को थिएटर में देखने वालों के लिए दुआ मांगेंगे !

आप निर्देशक की हिम्मत और ईमानदारी की शायद दाद देना चाहेंगे , इस फ़िल्म के ट्रेलर से घटियापन और बोरियत टपक टपक कर बह रही है। फिर भी साजिद अली ने काबिल-ऐ-तारीफ बेमिसाल बहादुरी का परिचय देते हुए ये ट्रेलर रिलीज़ किया है। आप इस फ़िल्म को देख के बंसाली की सांवरिया देखिये आप के सारे शिकवे बंसाली से दूर हो जायेंगे। 



कुल मिला कर पूरी फ़िल्म में खानदानी दुश्मनी के दरमियान उभरी प्रेम कहानी है। शायद अंत में  पुरानी प्रेम कहानियों की तर्ज़ पर प्रेमी जोड़े का मरना भी तय दिख रहा है। १२४ सेकंड के इस ट्रेलर को मैं कुछ बासठ सेकंड के बाद बंद कर देना चाहता था पर मजबूरन देखा। अब सोचिये के जो दो घंटे से ऊपर की फ़िल्म झेलने जायेंगे उनकी आँखों से कितने आंसूं टपकेंगे। उन दर्शकों से ज़्यादा शायद एकता कपूर के आंसूं टपकेंगे।  वैसे भी ऐसी कहानी को हाथ लगाने के लिए एकता कपूर ने सोचा क्या था वो जानना ज़रूर दिलचस्प  होगा। 


ट्रेलर में एक ऐसी बात एक संवाद एक घटना ऐसी नही जो आपको फ़िल्म देखने की तरफ सोचने भी दे देखना तो दूर की बात है। कुल मिला कर ये ट्रेलर बहुत से समझदारों को बचा चुका है। अगर आप जेब खर्च के लिए पैसे बनाना चाहते हैं तो इस फ़िल्म की रिलीज़ के दिन सर दर्द की गोलियां ले के थिएटर के बहार मौजूद रहें , मेरी गारंटी है के ब्लैक में बिकेंगी !


This trailer has got screaming messages of celluloid torture in it !

Boy falls in love with a girl. Boys daddy hates girls daddy. Initially girl dislikes boy. Then girl likes boy. Then they fall in love. Then khaandans get angry. Then I think they die. Guys I have written this real original story. Trust me no one has ever thought of it before.

The trailer of Laila Majnu is as convincing and as original as these lines written above. The director has set it in kashmir and has tried to fit the traditional LM story on the current background of Kashmir maybe.


The trailer is 124 seconds of epic unwatchability. You might have asked what credentials did Sajid Ali bring to the table to become a director guess your answer is as good or as predictable as mine.

The trailer does not have one moment of interest in it. At least the trailer of the disappointment called Dhadak had one epic moment where Ishan sings a popular hindi number in English.

Seriously the only thing we should do is pray for Ekta Kapoor at this rate govt will have to find two buyers or club her production house with Air India's sale.

This trailer is also an example of how makers rarely read or understand their own screenplay. The only good thing about this trailer is that the canteen waala will save money by not ordering extra perishable samosas and sandwiches in the theater.

Given the trailer this movie can only be saved by sonymax , remember what they did to Sooryavansham ?


चलिए किसी ने काजोल को ध्यान में रख कर फ़िल्म बनायी है ! - हेलीकाप्टर ईला ट्रेलर !



नब्बे के दशक की अभिनेत्रियों में जो कद काजोल का था शायद उनका आधा किसी दूसरी अभिनेत्री का नही था। बहुत सारे लोग शायद अब इस बात को भूल गए हैं के दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे और करन अर्जुन जैसी फिल्में उनके होने से भी उतना ही चली जितना शाह रुख की मौजूदगी की वजह से।


एक ढंग से ठीक भी था के बार बार निर्देशक उनकी और शाह रुख की जोड़ी के कद को भुनाने के लिए पिछले दस साल में काजोल को अगर हमारे सामने ला पाए तो सिर्फ उसी घिसी पिटी लीक पे या इस उम्मीद से के शायद उनकी फ़िल्म भी सुपरहिट हो। एक ढंग से ये काजोल का सम्मान भी था लेकिन एक ढंग से इतने उम्दा अभिनेत्री को ये भी कहने के कोशिश की गयी के बिना शाह रुख कुछ न होगा।

इसलिए हेलीकाप्टर ईला  का ट्रेलर थोड़ा तो बस मुझे इसलिए ही अच्छा लगा के किसी ने तो काजोल के व्यक्तिगत कद को इज़्ज़त देने की कोशिश की। हेलीकाप्टर ईला  का ट्रेलर जब आप देखने तो बार बार सोचेंगे के इस अभिनेत्री ने परदे से दूर रह कर हम लोगों को भी और अपनी खुद की क्षमता के साथ भी ज़्यादा न्याय नही किया।

खैर हेलीकाप्टर ईला  का ट्रेलर काजोल की वजह से देखने लायक है। ट्रेलर में कॉमेडी अच्छी है और एक दिलचस्प कहानी दिखाने की कोशिश की गयी है। कैसे कुछ माँ बाप बच्चों को खुश रखने के चक्कर में अपनी ज़िन्दगी तो बरबाद करते ही हैं बच्चे भी कितना बंध जाते हैं ये इस ट्रेलर में निर्देशक ने कह दिया है।

ट्रेलर से आप इतना निर्णय कर लेते हैं के फ़िल्म देखनी चाहिए और यही किसी भी ट्रेलर की पहली कसौटी भी होती है। ट्रेलर में इस बात की भी झलक है के फ़िल्म थोड़ी जज़्बाती भी है।

फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पे क्या करेगी और असली फ़िल्म कैसी है ये कहना मुश्किल है लेकिन ट्रेलर कम से कम एक औसत से ऊपर फ़िल्म की तरफ़ इशारा ज़रूर कर रहा है।


Monday, August 6, 2018

Finally someone gave Kajol a worthy role – Helicopter Eela Trailer review !!




Kajol has worked in a Dushman. She has delivered a very mature performance in Yeh Dillaggi too. However given her iconic pairing with SRK .Bollywood defined her second innings only with comeback movies with SRK. To be fair the pair has a legendary box office record. Ask yourself is Kajol only about getting paired with SRK ?


Finally it has taken another production house to give her a role which will make us see her as the actress she is ,not just the fabled famous SRK love interest. I emphasis I have no problem with that in fact some of those movies I have enjoyed.
Helicopter Eela is Kajol’s first full role in some years. It is always a difficult and sometime irrational task to try and assess a movie based on its trailer but fact is Helicopter Eela is a good trailer. It points to a well written story of a possessive protective mother. Who has her own loneliness to blame for it.
A son who loves his mom but is also feeling suffocated. A very very interesting story premise that the mom lands up in the same class same college to be with her son.
A very profound message –  love and be devoted but don’t do it to the extent that someone else feels suffocated.
The trailer has moments of humour a necessary element to make such a movie watchable. The most brilliant one comes in the end and is based on how a lot of parents lie about their marks to their kids.
This one will be a good watch and Kajol finally has something better to do in a movie that offers her stand alone limlight



Saturday, August 4, 2018

मुल्क - उबाऊ ज़्यादा या छोटी सोच की फ़िल्म ज़्यादा ये फैसला करना आपके लिए मुश्किल होगा !



मुल्क फ़िल्म की शुरआत में एक दृश्य आता है जब एक आतंकवादी सुरक्षा बल के एक अधिकारी की गोलियों का शिकार हो  जाता है। मरते समय अचानक निर्देशक हमें उसके बचपन के पल दिखाने लगते हैं जिसमे एक प्यारा सा बच्चा बार बार अब्बू अब्बू बोल रहा है। इस आतंकवादी की वजह से सोलह लोग मारे गए हैं एक बम धमाके में लेकिन जब निर्देशक ऐसा कुछ दिखाता है तो लगता है के वो हमसे एक आतंकवादी के लिए सहानुभूति की उम्मीद लगा रहा है।

एक संयुक्त परिवार के छोटे से घर में दो लड़के आतंकवाद की विचारधारा की तरफ झुकने लगते हैं लेकिन हर वक्त छोटे से घर में बसा ये परिवार इस बात को जान नहीं पाता। ध्यान रहे के ये परिवार लगभग हर वक्त साथ साथ घुला मिला रहता है।

जो सुरक्षा बल का अधिकारी खतरनाक मिशनों में अपनी जान तक दाव पे लगता है उसे अपनी नाक के नीचे आतंकवादी बनते बच्चों की जानकारी नही रखने वाला शख्स ज्ञान दे के जाता है फ़िल्म  के अंत में और हमें ऐसा दिखाया गया है के उस अधिकारी को पश्चाताप सा हो रहा है।



मुल्क की पटकथा और उसके सन्देश की सोच इतनी लचर और छोटी है के फ़िल्म देखते देखते आप ये सोचने लगते हैं के इस बकवास फ़िल्म को मीडिया के एक बड़े वर्ग ने बोरे भर भर के सितारे क्यों बांटें हैं ?

कुछ समय पहले बिला वजह फंसा दिए गए एक निर्दोष मुस्लमान की कहानी पर अक्षय कुमार की जॉली एल एल बी २ आयी थी जिसकी कहानी में सन्देश भी था  जिसकी न्यायालय से जुड़ी कहानी में कसाव और तथ्य आधारित वकीलों की बहस थी।  इस फ़िल्म में दोनों वकील अपनी अपनी ढपली सी बजा रहे हैं। निर्देशक ने जो थोड़ा बहुत तथ्य दिखाने की कोशिश की है उनका झुकाव भी उसने जज़बाती बना दिया है। फ़िल्म के अंत में तापसी रोते रोते अपनी दलील पेश करती हैं ठीक है इससे थोड़ा जज़्बाती दर्शक ताली बजा देगा लेकिन फ़िल्म इससे बहुत फूहड़ दिखती है।

निर्देशक ने फ़िल्म को हिन्दू मुस्लमान एकता पर दिखाने बनाने की कोशिश की है लेकिन कोशिश इतनी सतही और घिसी पिटी है के ये फ़िल्म सिवाय एक सौ चालीस मिनट की बरबादी के और कुछ है नही।  मेरी रेटिंग आधा स्टार वो भी ऋषि कपूर के अभिनय के लिए।


Friday, August 3, 2018

इस हफ्ते की सबसे मनोरंजक और शायद इस साल का पहला सुखद आश्चर्य है - कारवां !!



अजीब बात है के बिना ढोल नगाड़े और तरह तरह के प्रमोशन के बिना रिलीज़ हुई ये फ़िल्म कितनी अच्छी बनी है और अपनी शुरुआत के कुछ पंद्रह मिनट में आपका दिल जीत लेती।  अपनी अपनी मुसीबतों ,ज़िन्दगी की चोट झेलते किरदार एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं और दो घंटे से थोड़ा काम समय में निर्देशक ने आपके सामने ज़मीन से जुडी ऐसी कहानी पेश की है जो आपको मुस्कुराने और कहीं कहीं थोड़ा सोचने के लिए छोड़ देती है।

अपनी ज़िन्दगी से उलझता एक नवयुवक अविनाश (दुलकर सलमान) एक दिन ये समाचार पाता है के उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है।  अपने दोस्त शौकत के साथ वो दक्षिण भारत की एक यात्रा पे मजबूरन निकलता है क्यूंकि उसके पास एक दूसरी महिला का शव आ जाता है और उसके पिता का शव उस महिला के घर चला गया है।



फ़िल्म यहाँ से लगातार घुमाव लेती है और मैसूर ,ऊटी ,कुमारकोम और कोयम्बटूर जैसे शहरों से घूमती अपने आखिरी हिस्से में पहुँचती है। यहाँ इस कहानी में इरफ़ान की इतनी ज़बरदस्त भोपाली लहजे में बोलने वाले शौकत की कॉमेडी है। उनकी और दुलकर सलमान के बीच की सहजता और नोंक झोंक फ़िल्म को एक रंग देती है। मिथिला पपारकर कहानी का तीसरा पात्र हैं और उन्होंने भी अपने ढंग से इस तिकड़ी को देखने लायक बनाया है।

दुलकर सलमान की तारीफ करनी होगी के इरफ़ान जैसे ज़बरदस्त कलाकार  के सामने भी वो दर्शकों को अपने भी कुछ होने का एहसास कराते हैं। अगर उनकी आवाज़ को डब नही किया गया है तो ये दक्षिण भारत का पहला अभिनेता है जो इतनी ज़बरदस्त हिंदी बोलता है। दक्षिण भारत से आने वाले अभिनेताओं को छवि को दुलकर बदल सकते हैं।

फ़िल्म की सबसे बड़ी  ख़ूबी है के निर्देशक ने बिना  लेक्चर दिए बिना जज़्बाती हुए दर्शकों के सामने एक दिल को छूने वाली कहानी परोस दी है। कहीं भी वो कहानी को ढीला नहीं होने देते। ये किसी एक्शन फ़िल्म के जैसी पटकथा नहीं है लेकिन फिर भी इस फ़िल्म  की सादगी में एक ऐसी चमक है जो आप फ़िल्म देखते हुए संवादों , गानों और घटनाओं के ज़रिये ही महसूस करते हैं।

इस हफ्ते बॉलीवुड ने पूरे ढोल ताशे के साथ दो फिल्में रिलीज़ की हैं , लेकिन कहते हैं के भारी बर्तन गिरता भी है तो ज़्यादा आवाज़ नहीं करता।  कारवां वो भारी बर्तन है।  ज़रूर देखें।


Thursday, August 2, 2018

Where is the Cinema of long run ?




I recall the interview of one of our most noted blockbuster maker of the 80s and 90s called Anil Sharma. Look at his track record of cinema which won purely on content. Shradhanjali his first superhit which redefined female oriented cinema won the box office purely on content . Then came Hukumat which became the biggest hit of 1987 purely on its dialogues and an iconic new villain called Sadashiv Amrapurkar. His biggest content victory was a movie called Elaan-E-Jung in 1989 , this one was released right in between two Amitabh releases Toofan and Jaadugar both of which bombed at the box office but Elaan-E-jung was a rocking hit. In this interview however he lamented how content was going down and as a result the 75 week and 25 week  in theater  movies were no longer happening .He predicted in this interview in the mid 1990s that there will be a day when movies will run for three days and people will say –wah kya picture banayi hai !! . Today his prophecy has come true.
Bollywood now makes shoot and scoot cinema. Cinema that does not live to see Monday when released on Friday.  Race3 and Dhadak both belong to this example in the recent past. Movies which ran huge numbers on weekends and found vacant seats on Monday.
All of it is blamed on piracy on the internet or the dwindling audience interest. We are told the audiences no longer keep movie watching as on option beyond the weekend .Look hard and you will find how weak and shallow this argument is. The audiences will come in numbers if your movie is good. They still love cinema and for all the options of net piracy available to them they will want to watch it on screen.
The recent run of Baahubali proves that good cinema which has some content in it will find audiences. Forget a movie as well mounted,marketed and received as Baahubali. There is a huge heart warming example of a movie called Parmanu. The movie had very limited promotion and call it the myopia of the multiplex chains that this movie had its screens of release reduced every passing week. Yet this movie has clocked more than 50 days on screens across India. The audience came back because they rarely know what went behind the scenes in Pokharan in 1998 and they wanted to know. John Abraham’s production team set up a good story and the audiences came in droves.
Had the multiplexes given some screens that went to duds of overrated superstars this movie would have counted a little more moolah too. The point is simple that audiences will watch what has content.
Bollywood makers also yearn for long term recognition for all their external posturing of bowing down to this shoot and scoot cinema otherwise what is the point behind all these trends that pop up on social media which tell you today is 8th year of release of  dumbakdumba returns or 4th year of release of humbadumba goes. These poor makers who think digital strategy will make up for lack of content grossly keep showing their lack of knowledge of their own customer.
Audiences will come back for content wherever they see it . Tigmanshu Dhulia’s Haasil sank without a trace on box office but has become a cult on the internet. Is it not the victory of content and therefore the fact that long time running movies are still a possibility that the makers of the sleeper hit happy bhaag jayegi are now coming with a sequel?
Bollywood’s audience is still around they find a Sahib Biwi and Gangster 3 so pathetically disappointing that they decide to shower all the love on Mission Impossible 6. It is like a disappointed employee walking into a rival company because he gets respect there. Imagine the audiences and run time Sahib Biwi aur Gangster 3 would have counted had it been even half as good as MI6.
Remember Sridevi’s MOM ? that movie clocked runtime in theaters of decent length after it grew on word of mouth purely on its content power. There is a huge small town segment which still has only cinema as its entertainment option. Bollywood has to get its act right and you will see the return of 100 days and silver jubilee cinema.  Looks impossible but is highly plausible.

Published in The Hans India too

It has been a 21 year wait but the master story teller has returned ! and how !

During the late 80s and then early 90s JP Dutta was one of my most favourite directors. His movies did not have half measure moments. The canvas ,background music,characters everything would be large scale. He understood drama. Then since Border 1997 the man went downhill. My kind of fans kept the memories alive by catching Ghulami or Yateem on DVDs. 

Today I saw the trailer of Paltan. The master story teller seems to have returned. To show all of us that he is not done. Not yet. Thank you god for giving us the JP Dutta we knew.

The trailer of Paltan is 192 seconds long and that is some length JPD does not do anything in precise mode. The thrilling part is the trailer keeps you hooked for its entire 192 seconds given the dud trailers I have seen in the recent past which were barely bearable for their two odd minutes length this in itself speaks great in favour of the movie.



The trailer has epic goosebumps moments.Right from scenes where Indian and Chinese soldiers are in hand to hand and eyeball to eyeball conflict. Some real sharp dialogues. Great Visuals and a heavy duty background music.

The movie and the trailer obviously does not have a single heavy duty star of current box office status yet the trailer holds you and you want to know what happens next particularly when you see a chinese soldier knocking down an India soldier.

The movie trailer builds unabashed patriotism and yet it does not get boring or at no point do you feel that I have seen this before.

Paltan is the return of JP Dutta to epic form and this one will create a rage on the box office. Cynics will be surprised by the numbers of this one. Remember you read it here first. 

Welcome back JP Dutta this trailer shows that the 21 year wait was worth it.


पलटन का ट्रेलर देख के आप कह सकते हैं इस फ़िल्म की बॉक्स ऑफिस पर सफलता तय है !

पलटन का ट्रेलर पूरे १९२ सेकंड लम्बा है लेकिन सवा दो मिनट के उबाऊ पकौ ट्रेलरों से कहीं ज़्यादा दम इस फ़िल्म के ट्रेलर में दिख रहा है। हमारी सेना की ज़बरदस्त जीत की एक भुला सी दी गयी कहानी पर बनी ये फ़िल्म अपने ट्रेलर में बहुत अच्छी बनी हुई दिख रही है। पूरे ट्रेलर में संवाद ,घटनाएं और संगीत का मिला जुला प्रभाव ये होता है के कई नए सितारों को तो आप पहचानने की कोशिश भी नही करते। 

सोनू सूद , जैकी श्रॉफ और जॉन अब्राहम जैसे सितारे बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा पकड़ नही रखते हैं लेकिन यहाँ इस फिल्म के ट्रेलर को देख कर लग रहा है के बॉक्स ऑफिस पर एक तगड़ी कामयाबी इनके सेहरे बंधेगी। 
फ़िल्म का ट्रेलर आपके अंदर देशभक्ति का एक जूनून सा पैदा करता है और ये इस ट्रेलर की सबसे बड़ी कामयाबी है। अगर कोई ट्रेलर दर्शकों के जज़्बात जगा दे तो फ़िल्म की कामयाबी तय है। 
जे पी दत्ता ने जज़्बाती मौकों को कम से कम ट्रेलर में कहानी से आगे नहीं जाने दिया है और इसलिए भी लगता है के पलटन भारतीय सेना के कारनामों पर बनी एक यादगार फ़िल्म ज़रूर बनेगी। 
मेरे जैसे दर्शकों के लिए तो एक मनचाहे निर्देशक की इक्कीस साल बाद किसी ज़बरदस्त फ़िल्म से वापसी का लम्हा, ये ट्रेलर बन गया है। कहते हैं सब्र का फल मीठा होता है लेकिन ये ट्रेलर तो मीठा, मसालेदार और धमाकेदार फल है। 
मुझे अब दिन दर दिन इस फ़िल्म के रिलीज़ का इंतज़ार होगा। ये पल्टन बॉक्स ऑफिस पे सबको रौंद के आगे जाएगी इतना तय है !




Is this the end of the Khan triumvirate kingdom in Bollywood?

2018 has been a very unique year. In a lot of ways this has been an interesting year for those who can understand the historical churns...